
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के प्राध्यापक डॉ. रोहन चौधरी को बिना अनुमति अनुपस्थित रहने के आरोप में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। इस फैसले को चुनौती देने के लिए डॉ. चौधरी ने दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया। दिल्ली हाईकोर्ट ने फिलहाल बर्खास्तगी के आदेश पर रोक लगा दी है और उन्हें विश्वविद्यालय न्यायालय के समक्ष अपील करने का निर्देश दिया है।
मामला क्या है?
महाराष्ट्र के रहने वाले डॉ. रोहन चौधरी ने 15 अप्रैल 2024 को जेएनयू के सेंटर फॉर पॉलिटिकल स्टडीज़ (सोशल साइंसेज़ फैकल्टी) में प्रोफेसर के तौर पर ज्वॉइन किया था।
वे प्रोबेशन पर थे।
मई 2024 में निजी कारणों से उन्होंने छुट्टी ली। बाद में उनके बेटे की तबीयत बिगड़ने के कारण उन्होंने छुट्टी बढ़ाने की अनुमति भी विभाग प्रमुख से ली थी।
8 जुलाई 2024 को वे फिर से काम पर लौट आए।
इसके बावजूद उन पर यह आरोप लगाया गया कि वे बिना अनुमति 51 दिन अनुपस्थित रहे। इसी आधार पर 27 अगस्त 2025 को कुलपति डॉ. शांतिश्री पंडित की अध्यक्षता में हुई कार्यकारी परिषद की बैठक में उनकी सेवा समाप्त करने का निर्णय लिया गया।
हाईकोर्ट का फैसला
जेएनयू की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील ने दलील दी कि विश्वविद्यालय अधिनियम 1966 के तहत “विश्वविद्यालय न्यायालय” नामक संस्था भी है और उसके पास अपील का अधिकार है।
इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि डॉ. चौधरी को एक सप्ताह के भीतर विश्वविद्यालय न्यायालय में अपील करनी होगी। तब तक उनकी बर्खास्तगी पर रोक रहेगी। कोर्ट ने साफ किया कि वह किसी भी पक्ष के समर्थन या विरोध में फैसला नहीं दे रही है।
जेएनयू टीचर्स एसोसिएशन (JNUTA) का विरोध
जेएनयूटीए ने इस बर्खास्तगी को “ग़ैरकानूनी और मनमानी” बताया है।
संगठन का कहना है कि चौधरी के खिलाफ कोई ठोस सबूत या गंभीर आरोप नहीं हैं।
उनका आरोप है कि निर्णय प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है और यह “व्यक्तिगत बदले” से प्रेरित है।
जेएनयूटीए के अध्यक्ष सुरजित मजुमदार ने कहा कि बैठक में यह मुद्दा अचानक उठाया गया, सदस्यों के माइक्रोफ़ोन बंद कर दिए गए और किसी को अपनी राय रखने का मौका नहीं दिया गया।
51 दिन की छुट्टी का विवाद
16–17 मई को चौधरी ने आधिकारिक छुट्टी ली थी।
21–31 मई तक विश्वविद्यालय की परीक्षाएँ चल रही थीं और उन्हें कोई ड्यूटी नहीं सौंपी गई थी।
1 जून से 32 दिन ग्रीष्मावकाश था, जिसमें सभी शिक्षक घर जा सकते हैं।
नए शैक्षणिक सत्र का रजिस्ट्रेशन 15 जुलाई से होना था, इसलिए 8 जुलाई को उनका जॉइन करना सामान्य बात थी।
इस आधार पर उन्होंने दावा किया कि “51 दिन की अनधिकृत अनुपस्थिति” का आरोप पूरी तरह ग़लत है।
निष्कर्ष
डॉ. रोहन चौधरी का कहना है कि उनसे अनजाने में गलती हुई थी और उन्होंने माफ़ी भी मांगी है। लेकिन इसके बावजूद उनकी सेवा समाप्त करना “कैरियर बर्बाद करने की कोशिश” है।
फिलहाल, हाईकोर्ट के आदेश से उन्हें राहत मिली है। अब असली लड़ाई विश्वविद्यालय न्यायालय में लड़ी जाएगी।

