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कफ सिरप कांड: नागपुर में इलाज करा रहे मासूम बच्चों की हालत पर डॉक्टरों ने क्या कहा ?

मध्य प्रदेश में कफ सिरप के दुष्प्रभावों से गंभीर रूप से बीमार लगभग 11 बच्चों को इलाज के लिए नागपुर के शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय में भर्ती कराया गया। इनमें से 6 बच्चों की करीब 10 दिन के इलाज के बाद मौत हो गई, जबकि 5 की हालत अभी भी गंभीर है। इनमें से 3 बच्चे वेंटिलेटर पर हैं और 2 का डायलिसिस चल रहा है। उन्हें बचाने की पूरी कोशिश की जा रही है, ऐसा शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. मनीष तिवारी ने बताया। जानकारी के अनुसार, मध्य प्रदेश के कुछ बच्चों को नागपुर के ऐम्स और निजी अस्पतालों में भी भर्ती कराया गया है।
डॉ. तिवारी ने बताया, “
1 सितंबर को हमारे यहां पहला मरीज आया था। फिर एक और बच्चा भर्ती हुआ। इन बच्चों को तेज बुखार था और पेशाब नहीं हो रही थी। पहले हमें लगा कि यह सामान्य संक्रमण है, लेकिन 8 सितंबर को तीसरा बच्चा भी ऐसे ही लक्षणों के साथ आया। तब हमें एहसास हुआ कि यह कुछ अलग मामला है।” इन बच्चों की किडनी फेल हो गई हैं और कई के दिमाग ने भी प्रतिक्रिया देना बंद कर दिया है। कुछ की किडनी इलाज से चलने लगी है, लेकिन दिमाग से कोई रिस्पॉन्स न मिलने के कारण वे कोमा में हैं। डॉ. तिवारी ने यह भी संभावना जताई कि बच्चों की मौत “क्लोड्रिफ कफ सिरप” में पाए गए जहरीले रसायन डायइथिलीन ग्लायकॉल के कारण हुई हो सकती है।कहाँ और कितने मरीज?वर्तमान में नागपुर के शासकीय और निजी अस्पतालों में 0 से 16 वर्ष उम्र के 12 संदिग्ध एईएस (Acute Encephalitis Syndrome) के मरीज भर्ती हैं। इनमें 10 मध्य प्रदेश, 1 महाराष्ट्र और 1 तेलंगाना का बच्चा शामिल है। शासकीय मेडिकल कॉलेज में 6, एम्स में 2, न्यू हेल्थ सिटी में 1, लता मंगेशकर अस्पताल में 1, कलर्स हॉस्पिटल में 1 और गेट वेल हॉस्पिटल में 1 बच्चा इलाजरत है।
छिंदवाड़ा में एक महीने में 11 मौतें
पिछले एक महीने में मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में 11 और राजस्थान में 3 बच्चों की मौत के बाद दोनों राज्यों की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठाए जा रहे हैं। परिजनों का कहना है कि कफ सिरप पीने के बाद बच्चों की हालत बिगड़ने लगी और उनकी मौत हो गई। मध्य प्रदेश ड्रग कंट्रोल विभाग ने 4 अक्टूबर को तमिलनाडु में बनी “क्लोड्रिफ कफ सिरप” पर प्रतिबंध लगाया और सरकारी डॉक्टर प्रवीण सोनी, सिरप बनाने वाली कंपनी श्रीसन फार्मास्युटिकल्स के डायरेक्टर सहित कई लोगों पर मामला दर्ज किया।
1 अक्टूबर को मध्य प्रदेश सरकार ने तमिलनाडु सरकार को कंपनी की जांच करने के लिए पत्र लिखा था। बाद में जांच में पाया गया कि उस कंपनी के सिरप में भेसल मिली हुई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इसकी जानकारी सोशल मीडिया “एक्स” पर दी।राजस्थान में भी भरतपुर और झुंझुनू जिलों में दो बच्चों की मौत इसी सिरप से होने का दावा किया गया, जबकि 4 अक्टूबर को चुरु में भी एक बच्चे की मौत की खबर आई। हालांकि, राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खीवसर ने कहा कि जांच में सिरप में कोई घातक तत्व नहीं मिला, फिर भी एक समिति जांच कर रही है।केंद्र सरकार की नई गाइडलाइन। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिए हैं कि दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों को कोई भी कफ या सर्दी की सिरप न दी जाए, और पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों को सामान्यतः ऐसे सिरप न देने की सलाह दी है, क्योंकि छोटों में यह बीमारी आम तौर पर खुद ठीक हो जाती है।
सभी अस्पतालों को केवल जीएमपी मानकों के अनुसार बनी उच्च गुणवत्ता वाली सिरप ही खरीदने के निर्देश दिए गए हैं।बाल रोग विशेषज्ञों की रायडॉ. आवेश सैनी के अनुसार, यदि सिरप का रंग बदल गया हो, उसमें कण दिखें, या बैच नंबर मिटा हो तो वह संदिग्ध हो सकता है। ड्रग लाइसेंस नंबर हमेशा जांचना चाहिए। ऐसे सिरप से सांस रुकना, पोट दर्द, दौरे या हार्ट फेल तक हो सकता है।
डॉ. हर्षिता शर्मा ने बताया कि डायइथिलीन ग्लायकॉल और एथिलीन ग्लायकॉल असल में “कूलेंट” के रूप में प्रयोग होते हैं। इसका स्वाद मीठा होने से कुछ कंपनियां इन्हें सोर्बिटॉल के सस्ते विकल्प के रूप में इस्तेमाल करती हैं, लेकिन ये रसायन अत्यंत नेफ्रोटॉक्सिक यानी किडनी को नुकसान पहुंचाने वाले होते हैं।परिजनों की पीड़ानागपुर मेडिकल कॉलेज में इलाज करा रहे मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के नवीन दहेरिया ने बताया कि उनकी 18 महीने की बच्ची को सिरप पिलाने के बाद लगातार उल्टियाँ और पेशाब बंद हो गई। अब बच्ची नागपुर में भर्ती है और हालत गंभीर बनी हुई है।
इसी तरह किसान राजेश यदुवंशी ने बताया कि उनकी दो वर्ष की बेटी पिछले कई दिनों से विभिन्न अस्पतालों में भर्ती है, लेकिन हालत में सुधार नहीं हुआ। उन्होंने सरकार से बच्चों के अच्छे इलाज की अपील की है।

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