स्कूलों में सजा पर पूर्ण प्रतिबंध: सही फैसला या अनुशासन पर खतरा?
शासन के फैसले पर शिक्षकों में असंतोष

स्कूलों में छात्रों को किसी भी प्रकार की शारीरिक और मानसिक सजा देने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का शासन निर्णय हाल ही में जारी किया गया है। इस फैसले के बाद शिक्षकों के बीच तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। अधिकांश शिक्षकों का मानना है कि सजा पर पूरी तरह रोक लगाने से स्कूलों में अनुशासन बनाए रखना मुश्किल हो जाएगा।
शिक्षकों का कहना है कि वे बच्चों के दुश्मन नहीं होते, बल्कि उनके भविष्य को संवारने का काम करते हैं। ऐसे में सरसकट सजा बंद करना व्यावहारिक नहीं है।
“सजा नहीं होगी तो छात्र हाथ से निकल जाएंगे”
रचना स्कूल के शिक्षक नीलेश ठाकूर का कहना है कि यदि किसी भी प्रकार की सजा नहीं दी जाएगी तो कुछ शरारती और उपद्रवी छात्रों पर कोई नियंत्रण नहीं रहेगा।
उन्होंने कहा,
“अगर छात्रों को यह लगने लगे कि वे कुछ भी करें और कोई परिणाम नहीं होगा, तो अनुशासन पूरी तरह खत्म हो जाएगा। कक्षा में मारपीट हो तो शिक्षक क्या करेंगे? बच्चे की गलती और उसकी क्षमता को देखकर डर का अहसास कराना ज़रूरी होता है।”
“सजा का तरीका बदला जाए, खत्म न की जाए”
सागरमल मोदी स्कूल के शिक्षक हर्षल कोठावदे ने शासन के फैसले को आंशिक रूप से सही बताया, लेकिन पूर्ण प्रतिबंध पर आपत्ति जताई।
उनका कहना है,
“आज के छात्रों में सहनशीलता कम हो गई है। सजा से कभी-कभी नकारात्मक असर पड़ता है, यह सही है। लेकिन सभी तरह की सजा पर रोक गलत है। अनुशासन बनाए रखने के लिए सीमित और सोच-समझकर दी गई सजा जरूरी है। सरकार को सजा के स्वरूप में बदलाव पर विचार करना चाहिए।”
“शारीरिक सजा समाधान नहीं, सकारात्मक विकल्प जरूरी”
इस्पैलियर स्कूल की प्रधानाचार्या सबा खान का मानना है कि शारीरिक सजा से बच्चों में सुधार नहीं होता।
उन्होंने कहा,
“कागज़ों में तो सजा पर पहले से ही रोक है, लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं होता। कई बार शिक्षकों का तनाव बच्चों पर निकल जाता है। बच्चों में सुधार के लिए सकारात्मक और रचनात्मक अनुशासन जरूरी है। स्कूलों को वैकल्पिक अनुशासन पद्धतियों पर काम करना चाहिए।”
👉“स्कूलों में सजा पर पूर्ण प्रतिबंध एक दूरदर्शी और मानवीय निर्णय है, जिससे बच्चों की गरिमा सुरक्षित रहती है और अनुशासन डर से नहीं बल्कि समझ और संवाद से विकसित होता है।”
⭐ राज्य अध्यक्ष सैय्यद शफीक सर⭐
“बिना सजा बच्चों को सुधारना मुश्किल”
सरस्वती गुलाबराव पाटील स्कूल के प्रधानाचार्य सुनील बिरारी का कहना है कि शिक्षक जानबूझकर बच्चों को नुकसान नहीं पहुंचाते।
उन्होंने बताया,
“स्कूल में गाली-गलौज और मारपीट जैसी घटनाएं होती हैं। केवल समझाने से कई बच्चे जल्दी सुधार नहीं करते। हल्की सख्ती से कम से कम उन्हें यह याद रहता है कि उन्होंने गलती की है। शारीरिक या मानसिक नुकसान पहुंचाने वाली सजा गलत है, लेकिन पूरी तरह सजा खत्म करना भी सही नहीं।”
निष्कर्ष
शासन का यह फैसला छात्रों के अधिकारों की रक्षा के उद्देश्य से लिया गया है, लेकिन शिक्षक वर्ग का मानना है कि अनुशासन और सुरक्षा के लिए कुछ नियंत्रण आवश्यक है। अब सवाल यह है कि बिना सजा के स्कूलों में अनुशासन कैसे बनाए रखा जाएगा?
शिक्षकों की मांग है कि सरकार सजा के बजाय प्रभावी, सकारात्मक और व्यवहारिक अनुशासन नीति तैयार करे।




