शिक्षकों का महासंग्राम: संचमान्यता के नए नियमों के खिलाफ फूटा गुस्सा, हजारों नौकरियों पर संकट!
पुणे में उपसंचालक कार्यालय पर कनिष्ठ कॉलेज शिक्षकों का जोरदार धरना; मांगे पूरी न होने पर दी राज्यव्यापी उग्र आंदोलन की चेतावनी।

महाराष्ट्र में कनिष्ठ महाविद्यालय के शिक्षकों ने सरकार की नई संचमान्यता (Staff Approval) नीति के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का बिगुल फूंक दिया है। शैक्षणिक वर्ष 2025-26 के लिए प्रस्तावित नए नियमों के विरोध में ‘पुणे विभागीय कनिष्ठ महाविद्यालयीन शिक्षक संगठन’ के बैनर तले गुरुवार को पुणे विभागीय शिक्षण उपसंचालक कार्यालय के सामने एक विशाल और उग्र धरना प्रदर्शन किया गया।
शिक्षकों का आरोप है कि सरकार की इस नई नीति से न सिर्फ शिक्षा का स्तर गिरेगा, बल्कि हजारों शिक्षकों की नौकरियां और छात्रों का भविष्य भी पूरी तरह दांव पर लग जाएगा। इस आंदोलन में पुणे, सोलापुर और अहिल्यानगर (अहमदनगर) जिलों के कनिष्ठ महाविद्यालयीन शिक्षकों ने भारी संख्या में हिस्सा लिया।
क्यों भड़के हैं शिक्षक? (मुख्य कारण)
शिक्षकों के पद घटने का डर: प्रदर्शनकारियों ने चिंता जताई कि नए नियमों के कारण शिक्षकों के वर्कलोड (कार्यभार) में भारी कटौती होगी, जिससे राज्य भर में हजारों शिक्षक ‘अतिरिक्त’ (Surplus) हो जाएंगे और उनका अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।
शिक्षा व्यवस्था होगी ठप: शिक्षक प्रतिनिधियों का कहना है कि इस फैसले का बुरा असर केवल शिक्षकों पर ही नहीं, बल्कि पूरे राज्य की कनिष्ठ महाविद्यालयीन शिक्षा व्यवस्था पर पड़ेगा।
नारों से गूंजा परिसर, सरकार को घेरा
आंदोलन के दौरान शिक्षकों की गगनभेदी नारेबाजी और पदाधिकारियों के तीखे भाषणों से पूरा प्रशासनिक परिसर दहल उठा। इस महा-धरने में महाराष्ट्र राज्य कनिष्ठ महाविद्यालयीन शिक्षक महासंघ के महासचिव लक्ष्मण रोडे, पुणे विभाग के अध्यक्ष सोपान कदम, महासचिव प्राचार्य विक्रम काले, सोलापुर जिला अध्यक्ष हरिदास गवली और विभागीय कार्यकारी अध्यक्ष हिम्मत तोबरे सहित तीनों जिलों के सैकड़ों पदाधिकारी और शिक्षक एकजुट हुए।
मांगें पूरी नहीं हुईं, तो होगा राज्यव्यापी ‘चक्का जाम’
बढ़ते दबाव को देखते हुए विभागीय शिक्षण उपसंचालक डॉ. गणपत मोरे ने खुद आंदोलन स्थल पर पहुंचकर शिक्षकों का ज्ञापन स्वीकार किया। उन्होंने आश्वासन दिया कि शिक्षकों की इन मांगों को वह तुरंत और सकारात्मक रूप से सरकार तक पहुंचाएंगे।
शिक्षकों की प्रमुख मांगें:
संचमान्यता के नए और ‘अन्यायपूर्ण’ नियमों को तुरंत वापस लिया जाए।
पुरानी और प्रचलित पद्धति के अनुसार ही संचमान्यता जारी रखी जाए।
सरकार आधिकारिक जीआर (शासन निर्णय) जारी कर गारंटी दे कि किसी भी शिक्षक की पद कटौती नहीं होगी।
आंदोलनकारियों का अल्टीमेटम:
शिक्षक संगठनों ने साफ कर दिया है कि यह तो सिर्फ शुरुआत है। अगर सरकार ने इन मांगों को नजरअंदाज किया, तो आने वाले दिनों में पूरे महाराष्ट्र के स्तर पर एक बेहद उग्र और तीव्र आंदोलन छेड़ा जाएगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन की होगी।




