इन शिक्षकों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी जाएगी।
महाराष्ट्र राज्य के शिक्षा क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण बदलाव आ रहा है। राज्य के पिछड़ा वर्ग बहुजन कल्याण विभाग ने हाल ही में एक निर्णय जारी किया है जो हजारों शिक्षकों के भविष्य को प्रभावित करेगा।आश्रम स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए अब शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) पास करना अनिवार्य कर दिया गया है। इस निर्णय से राज्य के शैक्षिक समुदाय में हलचल मच गई है। कई वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों को अब नई परीक्षा पास करनी होगी। इस निर्णय के चलते शिक्षकों में चिंता और असंतोष बढ़ रहा है।परिपत्रक की मुख्य बातें:कक्षा पहली से आठवीं तक पढ़ाने वाले सभी शिक्षकों को दो साल के भीतर टीईटी परीक्षा देनी होगी।जो शिक्षक निर्धारित समय में टीईटी पास नहीं कर पाएंगे, उन्हें जबरदस्ती सेवानिवृत्ति दी जाएगी।यह कठोर नियम सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले पर आधारित है।जिन शिक्षकों के पास पांच साल से ज्यादा सेवा अवशेष है, उन पर यह नियम सख्ती से लागू होगा।जिनके पास पांच साल से कम सेवा बची है और अगर उन्होंने पदोन्नति का आवेदन नहीं किया है तो उन्हें टीईटी बिना सेवा जारी रखने की अनुमति होगी।शिक्षकों की नाराजगी और तर्क:अधिकतर शिक्षक इस निर्णय से असहमत हैं क्योंकि नियुक्ति के समय टीईटी अनिवार्य नहीं था।कई शिक्षक दस से बीस साल से सेवा में हैं और अब अचानक परीक्षा देने को कहना अनुचित मानते हैं।अनुभवी शिक्षकों को केवल परीक्षा से परखा जाना सही नहीं है; उनके कार्य और विद्यार्थियों के परिणाम ही उनकी काबिलियत का प्रमाण हैं।कई शिक्षक मानते हैं कि शिक्षण अधिकार कानून में सुधार करते वक्त वर्तमान सेवानिवृत्त कर्मचारियों को संरक्षण देना चाहिए था, न कि बाद में यह नियम लागू करना।शिक्षक संगठन और विभागीय समन्वय:राज्य के कई शिक्षक संगठन इस फैसले के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं और इसे वापस लेने की मांग कर रहे हैं।उन्होंने सरकार से बिना चर्चा एकतरफा निर्णय लेने के लिए आलोचना की है।शालेय शिक्षा विभाग ने अभी तक इस विषय में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है, जबकि पिछड़ा वर्ग बहुजन कल्याण विभाग ने अकेले यह निर्णय लिया है, जिससे विभागीय समन्वय की कमी स्पष्ट हो रही है।सुप्रीम कोर्ट का फैसला:सितंबर में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि पहली से आठवीं कक्षा के शिक्षकों के लिए टीईटी पास करना अनिवार्य है।इस फैसले के आधार पर राज्य सरकार ने अपनी नीति बनाई है।हालांकि, इस नीति के कारण हजारों शिक्षकों की नौकरियां खतरे में पड़ सकती हैं, खासकर दूरदराज के आश्रम स्कूलों में शिक्षक कम पड़ सकते हैं।शिक्षकों के सामने चुनौतियां:कई वरिष्ठ शिक्षकों के लिए परीक्षा की तैयारी एक बड़ी चिंता बन गई है, जिससे मानसिक, शारीरिक और आर्थिक दबाव बढ़ रहा है।ग्रामीण क्षेत्रों के शिक्षक निजी कोचिंग का खर्च नहीं उठा पाते, जो उनके लिए अतिरिक्त बोझ है।समाधान के संभावित उपाय:सरकार को सेवारत शिक्षकों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम और मुफ्त मार्गदर्शन उपलब्ध कराना चाहिए।परीक्षा में अनुभव का भी ध्यान रखा जाना चाहिए, ताकि केवल सैद्धांतिक ज्ञान पर निर्भर न रहना पड़े।शिक्षकों के अधिकारों और लंबी सेवा का सम्मान करते हुए संवेदनशील तरीके से इस नीति को लागू करना आवश्यक है।महाराष्ट्र के आश्रम स्कूलों के शिक्षकों के लिए यह एक महत्वपूर्ण मोड़ है। टीईटी अनिवार्य करने का निर्णय शिक्षा की गुणवत्ता हेतु लिया गया है, लेकिन इसे शिक्षक समुदाय के साथ संवाद और उनकी समस्याएं समझकर संतुलित रूप से लागू करना जरूरी है।




