टीईटी नतीजों पर ‘जातीय’ भेदभाव के आरोप? 89 अंक पाकर भी जनरल कैंडिडेट फेल, 82 वाला पास; योग्यता पर उठे सवाल
गुणवत्ता से समझौता: क्या कम अंक वाले उम्मीदवार को पात्र मानकर हम शिक्षा की गुणवत्ता से समझौता नहीं कर रहे हैं?

महाराष्ट्र शिक्षक पात्रता परीक्षा (MAHA TET) के हालिया नतीजों ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। मालेगांव सहित राज्य के कई हिस्सों में इस बात को लेकर नाराजगी जताई जा रही है कि एक ही परीक्षा केंद्र और एक ही कमरे में बैठकर समान स्तर का पेपर हल करने वाले छात्रों के बीच पात्रता को लेकर बड़ी खाई नजर आ रही है।
1. क्या है पूरा विवाद?
परीक्षा परिणामों के विश्लेषण के बाद उम्मीदवारों का आरोप है कि ‘कट-ऑफ’ के नियमों के कारण शिक्षा के क्षेत्र में योग्यता (Merit) की अनदेखी की जा रही है।
विवादास्पद तथ्य: सामान्य वर्ग (Open Category) का उम्मीदवार 88 या 89 अंक प्राप्त करने के बावजूद ‘अपात्र’ घोषित कर दिया गया है।
तुलना: वहीं, आरक्षित वर्ग (Reserved Category) का उम्मीदवार 82 अंक पाकर ‘पात्र’ (Qualified) घोषित हुआ है।
2. पात्रता के वर्तमान नियम
टीईटी परीक्षा के मौजूदा नियमों के अनुसार पात्रता का गणित इस प्रकार है:
सामान्य वर्ग (General/Open): 150 में से 90 अंक (60%) अनिवार्य।
आरक्षित वर्ग (Reserved): 150 में से 82 अंक (55%) अनिवार्य।
इसी 5% के अंतर के कारण 82 से 89 अंक के बीच रहने वाले सामान्य वर्ग के प्रतिभावान छात्र न तो सरकारी स्कूल में और न ही निजी स्कूल में शिक्षक बनने के योग्य माने जा रहे हैं।
3. उम्मीदवारों के मुख्य सवाल और आपत्तियाँ
नाराज उम्मीदवारों ने सरकार और शिक्षा विभाग के सामने कुछ गंभीर सवाल रखे हैं:
समान कौशल का तर्क: गणित, विज्ञान या पढ़ाने का कौशल जाति के आधार पर नहीं बदलता। फिर न्यूनतम पात्रता (Minimum Eligibility) में इतना बड़ा अंतर क्यों?
रोजगार पर संकट: आरटीई (RTE) कानून के कारण निजी स्कूलों में भी टीईटी अनिवार्य है। ऐसे में 89 अंक लाने वाला योग्य उम्मीदवार भी बेरोजगारी की कगार पर खड़ा है।
गुणवत्ता से समझौता: क्या कम अंक वाले उम्मीदवार को पात्र मानकर हम शिक्षा की गुणवत्ता से समझौता नहीं कर रहे हैं?
4. वैश्विक उदाहरणों का हवाला
विवाद के बीच कई विशेषज्ञों ने विकसित देशों के मॉडल का उदाहरण दिया है:
एकसमान स्कोर: अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में शिक्षक पात्रता के लिए ‘Uniform Passing Score’ यानी एकसमान अंक का नियम है।
तर्क: शिक्षण के पेशे में गुणवत्ता (Merit) सबसे ऊपर होनी चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ी को सर्वश्रेष्ठ शिक्षक मिल सकें।
निष्कर्ष और मांग
शिक्षण क्षेत्र में इस ‘जातीय’ अंतर को लेकर अब सोशल मीडिया और प्रशासनिक स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। उम्मीदवारों की मांग है कि सरकार इन मानदंडों पर पुनर्विचार करे और कम से कम ‘पात्रता परीक्षा’ में समानता लाए ताकि गुणवत्तापूर्ण प्रतिभा का सही उपयोग हो सके।
”जब प्रश्नपत्र एक है, कक्षा एक है, और जिम्मेदारी (पढ़ाना) भी एक ही है, तो पात्रता के मापदंड अलग क्यों?” — नाराज उम्मीदवारों का सामूहिक प्रश्न




