** भीतर से उठी कड़ी अपील ** मारुल और चालीसगांव जैसे गांवों में मौजूद विवादित मामलों को भी देखना चाहिए।
1) - तक ऐतिहासिक "जेल भरो आंदोलन" 2 )-सभी मुस्लिम समाज की दुकानें बंद रहेंगी।

जलगांव ज़िले में वक़्फ़ कानून के खिलाफ आंदोलन और कार्यक्रमों की घोषणा वक़्फ़ बचाओ समिति ने कर दी है। समिति ने यह निर्णय ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के मार्गदर्शन में लिया है और आने वाले दिनों में विभिन्न चरणों में आंदोलन को आगे बढ़ाने का रोडमैप जारी किया है।आंदोलन की कार्यक्रम रूपरेखा
* 3 अक्टूबर 2025 (जुम्मा) –
सुबह 8 बजे से दोपहर 2 बजे तक जलगांव शहर और ज़िले की सभी मुस्लिम समाज की दुकानें बंद रहेंगी।
*16 अक्टूबर 2025 (गुरुवार) –
दोपहर 12 बजे जिलाधिकारी कार्यालय पर आंदोलन और नारेबाज़ी होगी। मुख्यमंत्री सचिवालय कक्ष के सचिव के नाम एक विस्तृत निवेदन भी प्रस्तुत किया जाएगा।
* 27अक्टूबर 2025 (सोमवार) –
दोपहर 12 बजे से 2 बजे तक GS ग्राउंड पर धरना, उसके बाद 2 से 3 बजे तक कलेक्टर कार्यालय तक मार्च और तत्पश्चात 3 से 5 बजे तक ऐतिहासिक “जेल भरो आंदोलन” का आयोजन किया जाएगा।
* 2 नवम्बर 2025 (रविवार) –
जलगांव शहर में व्यापक गोलमेज परिषद आयोजित की जाएगी। इसमें मुस्लिम समाज के साथ-साथ अन्य वर्गों और धर्मों के जिम्मेदार प्रतिनिधि भी शामिल होंगे। इस परिषद में वक़्फ़ कानून के नुकसान पर चर्चा की जाएगी।
* नेतृत्व और संयुक्त अपील। *
इस महत्वपूर्ण बैठक में सदर मुफ्ती खालिद और कन्वीनर फ़ारूक़ शेख ने समाज के सभी वर्गों से बड़ी संख्या में शामिल होने की अपील की। उपस्थित जिम्मेदारों में अनीस शाह, वाहिदत शकील सर, अतीक शाह, साजिद मनियार, मौलाना उमेर नासिर, हाफिज अब्दुल रहीम पटेल, मौलाना कासिम नदवी, मौलाना इमरान काकर, रज्जाक पटेल, नजमुद्दीन शेख, मौलाना अन्वर भाई, जकी इदरीस समेत अनेक कार्यकर्ता और संगठनों के प्रतिनिधि शामिल थे.
* शांतिपूर्ण और संवैधानिक संघर्ष *
वक़्फ़ बचाओ समिति ने स्पष्ट किया है कि यह आंदोलन पूरी तरह से शांतिपूर्ण, संवैधानिक और लोकतांत्रिक दायरे में रहेगा। मुस्लिम समाज अपने धार्मिक और सामाजिक अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट होकर संघर्ष करेगा। आयोजकों ने इसे समाज की भलाई और वक़्फ़ संपत्तियों की सुरक्षा के लिए ऐतिहासिक कदम बताया।
** भीतर से उठी कड़ी अपील **
हालांकि, इस आंदोलन के बीच समाज के भीतर से एक गंभीर सवाल भी उठाया गया है। कुछ जिम्मेदार लोगों ने मांग की है कि आंदोलन शुरू करने से पहले जलगांव ज़िले के मारुल और चालीसगांव जैसे गांवों में मौजूद विवादित मामलों को भी देखना चाहिए। वहां कथित तौर पर दूसरों की जमीनों पर मस्जिद या मदरसे बनाए गए हैं और कहीं-कहीं मदरसे की जमीन औने-पौने दामों में बेची गई है। सवाल उठाया गया है कि क्या इस तरह की अवैध कब्ज़ेदारी इस्लामी और शरीअत की दृष्टि से सही है?इनसे अपील की गई है कि समिति और विशेषकर मुफ्ती हजरात पहले इन मसाइल को हल कराएं, ताकि आंदोलन को और मज़बूती और ईमानदारी के साथ आगे ले जाया जा सके। समाज के कुछ वर्गों का कहना है कि अगर पहले अपने घर के अंदरूनी मामलों को सुलझाया जाएगा तो अल्लाह भी इस संघर्ष को कबूल करेगा।
* नतीजा
जलगांव का यह आंदोलन न केवल वक़्फ़ कानून के विरोध का हिस्सा है बल्कि यह समाज के भीतर आत्म-निरीक्षण का भी अवसर बनता जा रहा है। जहां एक ओर संगठनों और नेतृत्व की एकता दिख रही है, वहीं दूसरी ओर आंतरिक खामियों को दूर करने की आवाजें भी बुलंद हो रही हैं।




